अकल्पनीय को साकार करना – सीमा प्रसाद की कहानी
- 27 मार्च
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जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है। प्लास्टिक का इस्तेमाल भी अनिवार्य सा लगता है, लेकिन क्या हो अगर इसका कोई समाधान हो?
मैसूर (कर्नाटक) की सीमा प्रसाद ने प्लास्टिक का एक अनोखा और आसान विकल्प ढूंढा है—लौकी।
वह लौकी के मोटे छिलके से रोज़मर्रा की कई उपयोगी चीज़ें बनाती हैं, जैसे कंटेनर, बर्तन, फूलदान, पेन स्टैंड और लैंपशेड।
साल 2017 में उन्होंने अपने पति कृष्ण प्रसाद के साथ मिलकर ‘कृष्णकला’ की शुरुआत की। इसके जरिए वे महिलाओं, बच्चों, कारीगरों और किसानों को सिखाती हैं कि कैसे लौकी से सुंदर और काम की चीज़ें बनाई जा सकती हैं।
सीमा का यह काम पर्यावरण के लिए अच्छा है और साथ ही ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करता है।

एक साधारण लौकी पर आमतौर पर लोग ध्यान नहीं देते और इसकी बिक्री भी कम होती है। इसकी 48 किस्में विलुप्त होने के कगार पर हैं।
लेकिन अब यहाँ के किसान लौकी का महत्व समझकर इसे बड़े पैमाने पर उगा रहे हैं। लौकी से बने उत्पाद बेचकर उनकी आय बढ़ी है और महिलाओं को भी काम मिला है।
‘कृष्णकला’ द्वारा बनाए गए उत्पाद बाज़ार में लगभग 500 रुपये में बिकते हैं। सीमा को तंजानिया और केन्या के एक संगठन से प्रेरणा मिली, जहाँ महिलाओं को लौकी से हस्तशिल्प बनाना सिखाया जाता था।
सीमा ने यह कला सीखकर अपने काम को आगे बढ़ाया। अब उनका लक्ष्य पूरे कर्नाटक में इसे फैलाना और धान, बाँस व घास जैसी चीज़ों से अपने काम का विस्तार करना है।

लौकी की कटाई के बाद उसे लगभग 45 दिनों तक सूखने के लिए रखा जाता है। इसके बाद उसमें एक छोटा छेद करके बीज निकाल दिए जाते हैं और उसे पूरी रात पानी में भिगोया जाता है। फिर उसकी बाहरी परत और अंदर का गूदा निकालकर उससे सुंदर कलाकृतियाँ बनाई जाती हैं।
‘कृष्णकला’ अब अपने उत्पादों में जैविक रंगों का उपयोग करने की दिशा में काम कर रही है, ताकि वे पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल बन सकें। टिकाऊ उद्यमिता का भविष्य सच में उज्ज्वल है।




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