एक ग्रामीण उद्यमी के एकाकी परिदृश्य में एकता की यात्रा
- 28 मार्च
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किसी व्यवसाय को शुरुआत से आगे बढ़ाने में नेटवर्किंग और समुदाय का बहुत बड़ा योगदान होता है।
ग्रामीण भारत में काम करने वाले उद्यमी हमारी अर्थव्यवस्था के गुमनाम नायक हैं। वे जुनून और दूरदृष्टि के साथ काम करते हैं और जानते हैं कि काम कैसे पूरा करना है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक उद्यमी हैं एकता अग्रवाल, जो 'पगडंडी फाउंडेशन' की संस्थापक हैं।
एकता देहरादून की रहने वाली हैं और 2019 से एक ग्राम पंचायत के 13 गाँवों में काम कर रही हैं।पगदंडी फाउंडेशन उन कारणों पर काम करता है, जिनकी वजह से लोग गाँव छोड़ते हैं, खासकर शिक्षा और रोज़गार से जुड़ी समस्याओं पर।
वह मुंबई से वापस अपने घर आ गईं, क्योंकि वह अपने परिवार के पास रहना और अपने क्षेत्र में काम करना चाहती थीं।
उनका सपना है कि गाँवों में ऐसे अवसर बनें, जहाँ लोग आगे बढ़ सकें और उत्तराखंड के ‘वीरान गाँव’ फिर से बस सकें।

ग्रामीण इलाकों में एक उद्यमी के रूप में काम करना आसान नहीं होता। यहाँ काम करते समय अक्सर अकेलापन महसूस होता है, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
यह सफ़र शुरुआत में शिक्षा पर केंद्रित एक संस्था से शुरू हुआ। बाद में इसने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग में कदम रखा। आज यह संस्था प्राकृतिक कपड़ों पर चित्रकारी और हाथ से पेंट किए गए वस्त्रों की बिक्री के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बना रही है और उन्हें पर्यावरण से जोड़ने का काम कर रही है।

जब आप किसी समुदाय की ज़रूरतों और भलाई को ध्यान में रखकर काम शुरू करते हैं, तो अक्सर शुरुआत और अंत अलग होते हैं।
एकता जैसे उद्यमियों के लिए, जो उत्पाद बनाने वाले लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाना चाहते हैं, कोई एक तय रास्ता नहीं होता।
सिर्फ़ Amazon जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर प्रोडक्ट लिस्ट करना ही काफी नहीं है—इसके लिए मजबूत नेटवर्किंग और सही रणनीति की भी ज़रूरत होती है।
एक बाहरी व्यक्ति के रूप में विश्वास बनाना
एकता की यात्रा सितंबर 2019 में शुरू हुई, जब उन्होंने देहरादून ज़िले की एक ग्राम पंचायत के 13 गाँवों का दौरा किया। सितंबर 2019 से जनवरी 2020 तक उन्होंने हर घर जाकर लोगों से जुड़ाव बनाया।
शुरुआत में उनका लक्ष्य बच्चों की शिक्षा को बेहतर बनाना था, लेकिन COVID-19 महामारी के कारण उनकी योजनाएँ प्रभावित हुईं और समुदाय के साथ लगातार काम करना मुश्किल हो गया।

इस दौरान, एकता और उनके संगठन ने समुदाय की ज़रूरतों के अनुसार खुद को बदला। उन्होंने तुरंत जरूरत वाली चीज़ें, जैसे साफ़-सफ़ाई का सामान, लोगों तक पहुँचाया। साथ ही, स्थानीय लोगों के लिए कमाई के मौके भी बनाए। उन्होंने अदरक और मिर्च जैसी फसलों को बेचने में मदद की, जिससे परिवहन और बाज़ार की कमी के कारण फसल बर्बाद होने से बच गई।
उन्होंने देखा कि उत्पादकों और बिचौलियों की कमाई में फर्क है। इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किसानों को उनके मुनाफ़े का सही हिस्सा मिले। सही दाम देकर और अच्छे संबंध बनाकर, उन्होंने किसानों की आजीविका को मजबूत किया।
एक ग्रामीण उद्यमी की क्या आवश्यकताएँ होती हैं?
जैसे-जैसे ग्रामीण उद्यमी अपने समुदाय को बेहतर समझते हैं, उन्हें यह एहसास होता है कि उन्हें खुद भी सहयोग की ज़रूरत है।‘मार्गशाला’ का उद्देश्य भी यही है—यह समझना कि उद्यमियों की मदद किस तरह सबसे अच्छे तरीके से की जा सकती है।

एकता कहती हैं, “मैंने मार्गशाला इसलिए जॉइन नहीं किया कि मुझे मार्केटिंग सीखनी थी—वह मैं पहले ही पढ़ चुकी हूँ। मैंने इसे इसलिए चुना ताकि कुमाऊँ और उत्तराखंड के गाँवों में रहने वाले दूसरे उद्यमियों से मिल सकूँ और समझ सकूँ कि वे अपना बिज़नेस कैसे सोचते और चलाते हैं।”
“मार्गशाला ने मुझे अपने काम पूरे करने में बहुत मदद की। कई बार हमें सब पता होता है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए एक छोटी-सी प्रेरणा की ज़रूरत होती है।”
वर्कशॉप और असाइनमेंट्स ने उन्हें एक साफ़ दिशा और योजना दी, जिससे वह तीन महीने की रणनीति बना सकीं। इस योजना की लगातार समीक्षा होती रही और उसमें सुधार किए गए, जिससे उनकी जिम्मेदारी और काम में निरंतरता बनी रही।
जैसा कि वह बताती हैं, मार्गशाला का आखिरी मॉड्यूल रणनीति पर आधारित था, जहाँ उन्होंने अगले 3 महीनों की कार्य योजना बनाई।अगर आप इसे गंभीरता से करते हैं, तो आपके पास एक साफ योजना होती है और उसे लागू करने में भी मदद मिलती है।अगले सत्र में यह देखा जाता है कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं—इससे जवाबदेही बनी रहती है।
आगे की राह: व्यवसाय के लिए रणनीति का विकास और सही बाज़ार की तलाश
एकता जैसी ग्रामीण उद्यमियों के लिए बाज़ार में अपनी अलग पहचान बनाना बहुत ज़रूरी है।वह चाहती हैं कि उनका काम मुनाफ़े के साथ-साथ समुदाय के फ़ायदे को भी ध्यान में रखे, न कि उसके साथ समझौता करे।
अपनी खास पहचान बनाने से उन्हें दूसरों से अलग दिखने और अपने व्यवसाय को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने में मदद मिलेगी।
वह बताती हैं कि बाहर से आने के कारण वे कृषि बाज़ार को पूरी तरह समझ नहीं पाईं, लेकिन प्राकृतिक रंगों और रंगे कपड़ों में उन्हें बड़ा अवसर नजर आया।
पिछले 3 सालों में पगदंडी फाउंडेशन लगातार आगे बढ़ रहा है। उन्होंने प्राकृतिक रंगों से कपड़ों पर हाथ से पेंटिंग का काम शुरू किया है। ये रंग पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं और स्थानीय लोग ही इन्हें बनाते हैं, जिससे उन्हें बाज़ार में अलग पहचान मिलती है।
अब तक, एकता ने 30 से 50 साल की उम्र की 7 महिला किसानों को ट्रेनिंग दी है। वह इन महिलाओं की राय लेकर ही उत्पादों की कीमत तय करती हैं। अब ये महिलाएं खुद प्रदर्शनियों में जाकर अपने उत्पाद बेच रही हैं, जिससे उन्हें अनुभव और पहचान दोनों मिल रही है।

उन्होंने देखा कि अब घर पर उनका आत्मविश्वास और फैसले लेने की क्षमता बढ़ रही है।जहाँ पहले उन्होंने कभी पेंटब्रश नहीं पकड़ा था, अब वे कमाई भी कर रही हैं और परिवार से सम्मान भी पा रही हैं।समुदाय उनका साथ दे रहा है, और ग्राम प्रधान ने उनके काम के लिए अलग जगह भी दी है।
एकता को उम्मीद है कि मार्गशाला उनके बिज़नेस में नए संपर्क बनाने और बेहतर मार्केटिंग सीखने में आगे भी मदद करेगी। वह लगातार मेंटरशिप मिलने का इंतज़ार कर रही हैं। उनका मानना है कि जब जुनूनी उद्यमी एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो आगे बढ़ने का सही रास्ता बनता है—जहाँ सिर्फ मुनाफ़ा नहीं, बल्कि कुछ अच्छा करने की सोच भी ज़रूरी होती है।
विकल्प संगम के लिए विशेष रूप से तान्या सिंह द्वारा लिखित




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